Wednesday, January 16, 2019

में



कुछ धुंदली सी यादों के बीच
सिमटा हूँ में
आईना  साफ़ करूँ या नज़रिया
यही सोचता हूँ में
चेहरे पे मुखौटे तो बहुत हैं
परत दर परत उतारता हूँ में


जिस्म से रूह तक का ये सफर
समझ लेता हूँ में
आईने में खुद को देख
कुछ सोच लेता हूँ में
दूर क्षितिज पे फैला है उजाला
वही परखने चला हूँ में।

~ १५/०१/२०१९~

©Copyright Deeप्ती

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