कुछ धुंदली सी यादों के बीच
सिमटा हूँ में
आईना साफ़ करूँ या नज़रिया
यही सोचता हूँ में
चेहरे पे मुखौटे तो बहुत हैं
परत दर परत उतारता हूँ में
जिस्म से रूह तक का ये सफर
समझ लेता हूँ में
आईने में खुद को देख
कुछ सोच लेता हूँ में
दूर क्षितिज पे फैला है उजाला
वही परखने चला हूँ में।
~ १५/०१/२०१९~
©Copyright Deeप्ती

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