Monday, June 8, 2020

बँसी की धुन



अक्सर मेरी निगांहें
उस पुल के नीचे बैठी उस 
शांत सौम्य औरत 
पर जम जाती थी
जब भी मेरी गाडी उस मोड़ 
पर पहुँचती थी।

कितनी निश्छल और शांत थी वो
प्लास्टिक की पन्नी वाली छत
एक मैला कुचैला सा बिछोना
पास में एक मिट्टी की मटकी
एक पोटली में कुछ सामान
हाथ में एक नन्हा बालक
और एक बाँसुरी

यही थी उसकी सम्पूर्ण दुनिया
उसकी मीठी बांसुरी की तान में
मैं अपनी सुधबुध खो देती थी
भरी दुपहरी में आत्मा को झंजोरता
शीततला भरता उसका स्वर
जैसे कृष्ण के चरणों के दर्शन कराता

वो मीरा सी बस अपनी बंसी
की धुन में खोयी रहती थी
उसका बालक भी बड़ा धीर 
नन्है नन्है कदमो से ठुमकता
आती जाती भीड़ का मन बहलाता
दो चार आने जो मिलते उसी से
अपना गुजर बसर करते थे

सामने बत्ती हरी हो गयी थी
मेरी गाडी धुल उड़ाती
वहां से आगे बढ़ रही थी
लेकिन उसकी मुरली
की मधुर तान मुझसे
यूँ लिपट गयी थी मानो
पुष्प की खुशबु अपने पुष्प से

उनकी सादगी और सरलता देख
मेरा मन हिलोरे खाता
कितनी सहज है ना 
जीवन की यह नैया
बस प्रभु भक्ति में हो विलीन
छोड़ो अपने रात और दिन

पेट भरने लायक 
करवा ही देते है 'वो' जुगाड़
फिर किस बात की होड़ है प्यारे
क्यों परेशान करते अपना मन
भावपूर्ण जीवन
जो भरा हो भक्ति रस से
सम्पूर्ण है अपने आप में।
-08/06/2020-

©Copyright Deeप्ती

1 comment:

  1. Sach hai...agar ye baat samajh jaye,to baat hi kya hai. Isse bada kaunsa sukh? Beautiful story.

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