Thursday, May 7, 2020

खुद पर काम करो




©Copyright Deeप्ती

बारिश


रात भर प्यासी धरती को 
तृप्त
करती रही प्रेम की बारिश
देखो, देखो ना अब कैसी 
निखर
गई है नहा कर उसी प्रेम में !


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मेरी खिड़की और तुम

उस दिन देखा था तुम्हे जल्दी जल्दी नुक्कड़ तक दौड़ते हुए
सुनने में आया था कोई लाश पड़ी थी
उघड़ी हुई , उजड़ी हुई खून में लथपथ
तुम्ही थे जो झट से ढांक दिया था उसे
फ़ोन घुमा एम्बुलेंस और पुलिस को बुलाया था
उस दिन तुम्हारी आँखों में गहन पीड़ा थी
जैसे वो कोई तुम्हारी अपनी हो
लेकिन
वो तो कोई नहीं थी तुम्हारी
फिर तुम क्यों रोए थे उसके लिए ?
.
.
फिर से हुई थी हमारी मुलाक़ात
उमस भरी दुपहरी में
भीड़ से भरी बस में
तुम सौदा पकडे एक कोने में टिके बैठे थे
तुमसे उस वृद्ध के झुकते कंधे देखे नहीं गए
झट अपना कोना छोड़
हाथ पकड़ प्रेम से बिठाया था
अपनी बोतल से पानी भी पिलाया था
और फिर एक मीठी लोक धुन छेड़
सब यात्रियों का मन बहलाया था
कोई भी तो नहीं था वहां तुम्हारा अपना
फिर तुम्हारे गानों में इतनी मिठास कैसे थी?
.
.

ठीठुर्ती दिसम्बर की वो काली रात
याद है मुझे वह भी
कैसे तुमने प्यार से
उस सड़क पर ठण्ड से तड़पते
कुत्ते के पास आग जला
गर्म दूध पिलाया था
साथ में अपना कम्बल भी उसे उढ़ाया था
उसने जब कृतघ्नता से
तुम्हारा हाथ चाटा
तब कैसी भीनी मुस्कान चमकी थी आँखों में
वो भी तो तुम्हारा कोई नहीं था ना?
.
.
जब उस मासूम कली को
कुचला था ज़माने ने
उसकी निश्छल हँसी को
छीना था किस्मत ने
रंगीन रेशमी वस्त्र का कर बलिदान
सूती सफेद चादर को अपनाया था
वहशी आंखे छेद गयी थी
तब उसका अंतर्मन
तब उसका हाथ थाम
सूनी मांग सजा
बढ़ाया था उसका सम्मान
तब गर्व से क्यों नहीं खड़े थे अपना सीना तान?
.
.
क्या अब भी ऐसा होता है
कौन हो तुम
आकाश से उतरे देवता हो
या हो कोई जीता सपना
खिड़की से हर रोज़ अपनी
देखा था तुम्हारा हर काम
ऐसे प्राणी भी होते है
मैंने तो सिर्फ दरिंदे देखे अब तलक
इस मतलबी दुनिया की भीड़ में
सिर्फ तुम ही एक
इंसान दिखे हो ।

~07/05/2020~


©Copyright Deeप्ती

Wednesday, April 8, 2020

होश



शुष्क हवाओं  के दरमियां
लहराते केशों के संग गान
चमकीली धुप में झुलसती
पीली पड़ी नाचती पत्तियां
बाजे चिड़ियों की मीठी तान
छोटे छोटे घरोंदों में थी नन्ही जान
जो कर रही अपना जल पान

स्वच्छ अम्बर में चमका चाँद
मनमोहक तारों ने दिया बाँध
खरगोश फुदक पंहुचा अपनी माँद
शीतल हवा के झोके ने
करे हया के सब परदे फाँद

दिल की बगिया महकी 
डाल पे चिड़िया चहकी 
फ़िज़ाओं के होश ले बहकी। 

~ ०७/०४/२०२० ~ 

©Copyright Deeप्ती

Tuesday, April 7, 2020

दिल की तड़प



सुबह शाम दिल को तड़पाएँ
खट्टी मीठी यादें , कड़क पापड सी

चटपटी बातें दिल को बहलायें
मसालेदार पापड़ी चाट सी

सी सी करती मेरी जिह्वा
नाचे बाजे जैसे कूकर की सीटी

श्रीखंड का है भोग लगाया
दिल को हमने कुछ यूँ बहलाया

~ ०७/०४/२०२० ~ 

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Monday, April 6, 2020

दोस्ती

Kindly Listen the Audio Version  of this .


हसरतों की इंतहां थी, राज़-ऐ-दिल  खोल आऊं
सोचती थी दोस्त कोई, साथ हो तो बोल आऊं

वो हसीं सी शाम थी,  राह में  मिले यूँ
बदहवासी में ढली, कहने लगी ये मोल आऊं

 जल रही थी जो ज़मीन, वो बादलों से हो चली तर
 कह उठा दिल यूँ न करना ये, की रिश्ता तोल आऊं

उस घटा को इस ज़मीन पे, मैं उतारूँ ये तम्मन्ना
तुम मिले तो सोचा, उस खुदा को बोल आऊं

मैं पड़ी थी मर गयी सी ,न खबर थी रात तक ये
दिन चढ़ा तो मौज आया, बात ये भी खोल आऊं

भीड़ में थे हम अकेले, ये न जाना सामने था
हमसफ़र इक साथ जिसके, सच भरे पल डोल आऊं

साथ रहकर भी अकेले, तुम हमेशा क्यों रहे हो
दो ज़हर अपना मुझे उसको कहीं घोल आऊं



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Tuesday, March 31, 2020

वीर ग्रहणी



सुनो सुनो ....
... घर घर की कहानी ,
      जहाँ डटी है वीर ग्रहणी .......
      

पापा की परी और सइयां की रानी
सो फीसदी बनी नौकरानी
घिस घिस बर्तन, घिस घिस कपडे
सूख गए हैं अब हाथ उसके

जिन हाथों में लहराती थी कलम कभी
आज थामे झाड़ू और करछी

ब्यूटी पार्लर के वे करिश्मे
जिसमे सफ़ेद बाल भी लगते काले
मुंह चिड़ा उससे बोले
घास फूस से हुई हैं भौंवे
बिन ब्लीच लगती जैसे 'कौवे'

कमर टूटी, दर्द से तड़पी
'कोरोना' के केहर से लिपटी

बेरहम swiggy , zomato ने छोड़ा साथ
किचन में ना दे रहा कोई हाथ
pizza , burger , परांठा और रोटी
दिनभर बाजे कूकर की सीटी

 सुनो सुनो ....
... घर घर की कहानी ,
      जहाँ डटी है वीर ग्रहणी .......।

~ ३०/०३/२०२०~


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