Friday, August 16, 2019

कृष्णा कथाएं - 2

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कृष्ण, कनहिया, गोविन्द, गोपाल, माधव, देवकीनंदन , यशोदानन्दन , नंदलाल ऐसे ही अनेको नाम से जानने वाले माखन चोर अपने सभी गोपियों के प्रिय थे।  नटखट और चंचल अपनी मधुर मुस्कान से सबका मन मोह लेते थे।  उनकी बाल लीलाएं देखने के लिए गोपियाँ झूठ-मूठ शिकायते ले कर आती थी बस उनकी एक झलक पाने भर से भाव विभोर हो जाती थीं।

अपने बालकाल में अनेकों लीलाएं उन्होंने अपने भक्तों को दिखाई थी।  आज उन्ही में से एक लीला यहाँ प्रस्तुत कर रही हूँ।

देवराज इंद्र अपनी ताक़त के गुरूर में चूर होने लगे थे।  वे समझते थे की वर्षा की ताक़त उन्हें सभी देवताओं से अधिक शक्तिशाली बनाती है।

इसी अभिमान में चूर एक बार देवराज इंद्र ब्रज के लोगों से क्रोधित हो गए। उन्होंने देखा की कृष्ण भक्त भक्ति में डूब सिर्फ कृष्ण के कहने पर गोवेर्धन पर्वत को पूजने लगे हैं।  लेकिन पर्वत से ज्यादा शक्तिशाली तो इंद्र खुद हैं। फिर कैसे बृजवासी उन्हें महत्त्व नहीं दे रहे , उनकी पूजा नहीं कर रहे हैं बल्कि गोवेर्धन पर्वत की कर रहे हैं।

क्रोध की अग्नि से जलते हुए बृजवासियों को दण्डित करने का प्रण करा। और बस घनघनाते , उमड़ते घुमड़ते घनघोर बादलों की टुकड़ी को ब्रज भूमि पर भरपूर बरसने का आदेश दे दिया। वे इतना बरसना चाहते थे की लोग घबरा कर उन्हें पूजने लग जाये।  बाढ़ आ जाये और सब खेत खलिहान , घर, चौपाल सब पानी में डूब जाये।

उनके आदेश का पालन करते बादल वृन्दावन के ऊपर एकत्रित हो गए और जम कर बरसने लगे।  इतना बरसे की बाढ़ की स्तिथि उत्पन हो गयी। गांववासियों के घरों में पानी भर गया और वे डूबने लगे। कुछ समझ में ना आने की स्तिथि में सब दौड़ते हुए कृष्ण के पास पहुंचे और उनसे मदद मांगी।

कृष्ण पहले से ही सब जानते थे की इंद्रा देवता क्यों रुष्ट हो गए हैं।  वे ये भी जानते थे की रुष्टता का कारण उनका खुद का घमंड था। इसका उन्हें ज्ञात कराना बेहद आवश्यक था।

"ज़िन्दगी में कभी अपने हुनर पर घमंड मत करना
क्यूंकि जब
पत्थर पानी में गिरता है तब
अपने ही वज़न से डूब जाता है "

कृष्ण ने सब भक्तों की प्रार्थना स्वीकार कर ली और सबको गोवेर्धन पर्वत के नज़दीक बुलवा लिया।  फिर बहुत ही आसानी से अपने बाएं हाथ की छोटी ऊँगली पर पूरे विशाल गोवेर्धन पर्वत को उठा लिया।  और एक बड़ी विशालकाई छतरी सी बना ली।  उस छतरी के नीचे सभी पशु पक्षी व ग्राम वासी सुरक्षित खड़े हो गए।

उनके इस चमत्कार को देख सब भाव विभोर हो गए और सब तरफ कृष्ण की जय जयकार गूंजने लगी।
भगवान कृष्ण की भक्ति और शक्ति देख इंद्र के बादल भी नतमस्तक हो गए और सब एक एक कर वापिस इंद्र लोक चले गए।  इंद्र का भी घमंड चूर चूर हो गया और वे भी कृष्ण की महिमा जान गए।

तो सब प्रेम से बोलो बांके बिहारी लाल की जय !
नन्द लाल की जय !
श्री कृष्ण की जय !

~ १६/०८/२०१९~ 
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