ना जाने क्युँ
नज़र मेंरी हटती नहीं
सामने कचनार के पेड़ पर
बने उस चिर्रया के घोंसले से
नन्हें पंक्षी पंख पसार उड़ने को हैं तैयार
आया वक्त घोंसले का वीरान हो जाने का
क्यों घोसले वीरान हो जाते है
क्यों सपने सब उड़ जाते हैं
हमारी खुशियां तो बस्ती उन्ही में है
क्यों हम इतने परेशां हो जाते है
चिरैयों को तो दुःख नहीं होता
वो तो स्वछंद आसमान को नापती जाती है
हमे भी सीख लेनी चाहिए इनसे
हमे भी पंख खोल खुले आसमान
में उड़ जाना चाहिए
मुस्कराते हुए
©Copyright Deeप्ती
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