धुंध में सिहरती उस काली रात का आलिंगन करे वो वहीँ सड़क पर पड़ी अकेली सिसकती रही। भेड़ियों की कहाँ कमी है इस जहाँ में। सुना था कभी की भेड़िये जंगल में रहते है लेकिन ये तो बहुत बाद में जान पायी की नज़र उठा कर देखो तो अक्ल पर जमी ग़लतफ़हमी की परत ही है । असल में श..श.. इंसानी भीड़ में सबसे अधिक भेड़िये पाये जाते हैं।
इनकी कोई नस्ल नहीं होती बस ये गंध पा शिकार पर शिकार करते है। शिकार फिर चाहे उनके अपने ही घर में क्यों ना हो। इनके पास कोई अंतर्मन नहीं होता। ये तो वो नस्ल है जो खुद अपने बच्चो तक को खा जाती है।
फिर वो तो एक कोमल मन की अबोध बच्ची है। वो कैसे बच पाती, कैसे गुहार करती और किससे करती। कहने को सब अपने हैं लेकिन फिर भी कोई भी तो नहीं है अपना। मासूम देह की गंध पा भेड़ियों की भीड़ जमा हो ही जाती थी। फिर भी एक कोने से बुझी हुई उम्मीद की किरण उसकी रक्षा करने में कामयाब होती रही। और फिर .... फिर वो किरण किन्ही अंधेरों में विलुप्त हो गयी । छोड़ गयी उसे अकेला इस भेड़िये की भीड़ में। कब तक छुपाऐ रखती अपने आप को। ज्यादा समझ भी तो नहीं थी। भगवान् ने बुद्धि की जगह खाली कर दी थी उसकी।
आज भेड़िये चचा ने बड़ी मनमोहक परियों वाली कहानी सुनाई थी। रंगीन और जादुई दुनियां में मीठे फल और सतरंगी फूल थे। पेड़ पर महकते झूले और चमकते रास्ते थे। कितनी सुन्दर सजीली मनमोहक दुनिया थी। यहाँ सिर्फ सुन्दर रंग ही रंग थे। कहीं भी कोई छोटा सा भी कीड़ा नहीं दिखा। बस वो बह गयी इस छलावे में इसी को सच समझने की भूल कर बैठी। अब निशब्द पड़ी है। अपने रिस्ते ज़ख्मों से मवाद को उफनते देख रही है। शून्ये को ताक रही है। इस काली रात्रि की तरह ही उसके अंदर भी सिर्फ कालिख ही कालिख भर गयी है।
क्या कभी भोर होगी?क्या कभी कोई किरण उसको छु भी पायेगी? या ये काली रात उसको आज ही निगल आज़ाद कर देगी? कौन जाने?
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