कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि पर हुआ था एक ऐतिहासिक धर्म युद्ध - कौरव और पांडव के बीच में - जो आज तक सभी के दिलो दिमाग पर छाया हुआ है।
युद्ध के पहले दिन अर्जुन ने देखा की उसके सामने खड़ी विशाल सेना है जिसमे उनके भीष्म पितामह , उनके गुरु द्रोणाचार्य ,अश्वथथामा , उनके अनेक भाई व् रिश्तेदार हैं।
अचानक उनको भीषण वेदना ने घेर लिया और उन्होंने जाना की वे यह युद्ध नहीं लड़ना चाहते हैं।
"सिर्फ ज़मीन के एक टुकड़े के लिए में अपने प्रियजनों के साथ युद्ध नहीं कर सकता । नहीं यह युद्ध में नहीं करूँगा "
ये सोचते हुए उन्होंने अपना धनुष और अन्य शस्त्र नीचे रख दिया और अपना निर्णय श्री कृष्ण को बताया
"हे कृष्ण ! ये पाप है। में अपने प्रियजनों के साथ युद्ध नहीं कर सकता। सामने तो सब अपने खड़े हैं उनसे कैसा युद्ध "
कृष्ण जान चुके थे अर्जुन के मन में दुविधा चल रही है। उन्होंने अपना असली विशाल विश्व स्वरूपं अर्जुन को दिखाया
में ही निर्माता , रक्षक व् विध्वंसक
में ही सर्वोच्च, में ही सूक्ष्म
पूरा संसार मेरी इच्छा अनुसार चलता है
मेरे इस रचाये हुए नाटक के तुम सिर्फ एक किरदार हो
जो भी कार्य सौपा जाये उसे अच्छे से करना तुम्हारा धर्म है
तुम अपना कर्म करो , फल की चिंता मुझ पर छोड़ दो
सब कुछ वैसा ही है जैसा होना चाहिए
में भूत , वर्त्तमान और भविष्य सब जानता हूँ
में हर जगह हूँ।
में और कोई नहीं,
में श्विष्णु हूँ ।
में श्विष्णु हूँ ।
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