Thursday, March 5, 2020

नदी




नदी बन बहुँ में मस्त
अठखेलियाँ खाऊँ पर्वत के समस्त
चंचल मन , यौवन तन
इधर उधर इठलाऊँ में

देखो, गुस्सा ना दिलाना
पागल मुझको ना बनाना
एक बार जो बिफर गयी
हाथ ना में फिर आऊँगी
कर के नष्ट सब रोडो को
आगे बढ़ती जाऊँगी

रुकना मैंने सीखा नहीं
बाँध ना मुझको पाओगे
बाहों में भरना जो चाहो
हाथ से फिसल में जाऊँगी

समझा क्या है तुमने मुझको
आज़ाद नदी हूँ में
बहना मेरा काम है
रुकने से अनजान हूँ 
नदी हूँ , एक शीतल
अल्हड़ नदी हूँ में ।




~~07/05/08~~

©Copyright Deeप्ती

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