Friday, May 8, 2020

आम का वो पेड़


तुम्हारे अहाते के
उस आम के पेड़ का
पीला पड़ा पत्ता
उड़ आया था मेरे खेत में
निर्मोही पुरवैया के साथ
उठा हाथ में जो रखा
दिला दी उसने वो सारी बीती बात

माँ के बखान ने 
कैसा मचाया बवाल 
दौड़ भाग आ गया था कोठी 
जानने तुम्हारा हाल
नन्है हाथ और नन्है पैर 
हो गया था बावरा में
देख के तुम्हारे नन्है नैन
ठाना था तभी मन में
तुम्ही हो मेरी जीवन संगिनी

कितना बना मज़ाक था में
अभी से क्या सोचना इतना
बड़ी तो इसे हो जाने दे
ऐसा कह टॉल दिया
रखा नहीं मेरा मान
मेरी बात हंसी में उड़ा
ठेस पहुंचाई थी मुझे
तुम तो बस गयी थी मुझमे
उसी पल से रग रग में

पायल की झंकार
गूंजाती मेरा मन
छन छन करती तुम 
आ गयी जीवन में
तोतली जुबां में मुझे पुकारना
कर देता मुझे बेहाल
तब सोचा था 
पछाड़ दूँगा में अपना काल

धीरे धीरे बड़े हुए
सुर और ताल मिलते रहे
उंच नीच का किसे था ज्ञान
हम दोनों तो थे बालक अंजान
नन्है कदमो से जब
सीखा तुमने चढ़ जाना पेड़
उसी की डाल पर बैठ
बुन डाले कितने सपने

मीठे आम और तुम्हारी हंसी
तीर सी घायल करती थी 
हमे क्या पता था की
वो तो बस ठिठोली थी
झूला झूल उसकी छांव में
हँसते और खिलखिलाते थे
कहाँ बीता वक़्त तब
इसका न था कोई भान

चौदह की तुम हो चली थीं
मेरे मन में पूरी बस चुकी थीं
चाहत चढ़ी परवान
जल्दी थी तब मुझे
करने को कोई नौकरी
आखिर ब्याह कर लाना था
तुमको अपनी ड्योढ़ी

ठाकुर साहब को जैसे 
खलने लगी हमारी जोड़ी
लगा दी थी हम दोनों पर
पैनी नज़र की लगाम
इस सब में हम भूल गए
स्वछंद खेलना और 
तोड़ खाना वो मीठे आम
भूल दुनिया का मेला
खो गए थे एक दूजे में

ठाकुरजी ने 
उसी पेड़ की ठंडी छांव
में किया तुम्हारा हाथ 
चौधरी के नाम
कैसी मौन चीखी थी तुम
में खड़ा रहा देखता 
चुप
क्या कहता?कैसे कहता?
करता जो नहीं था कुछ काम

दो दिन भी नहीं बीते थे
उस पेड़ के आम भी नहीं 
पके थे
क्यों मूंदी तुमने आँख
क्यों छोड दिया मेरा साथ
मेरा कुछ तो करती 
इंतज़ार
शायद में आ ही जाता

वहीँ छाव में उस पेड़ की
तुम निश्छल सो गयी 
और वहीँ सिमट कर रह गईं
उस मिटटी में 
शीतलता से मिल गयीं
देखा था एक अंकुर 
फूटते हुए इक दिन
क्या आ रही हो लौट कर
मेरे लिए हे प्रिय

जब जब हवा है चलती
उसी आम के पेड़ से गुज़रती
तोड़ लाती तब मेरे लिए
एक एक उसका सूखा पत्ता 
पत्ते पे हो सवार आ जाती
उसकी खुशबू से नहाई
उसकी सारी बातें
वो सारी चुराई रांतें
और साथ बिताई वो
खट्टी मीठी यादें।

तुम
चली गईं
छोड़ मुझे अकेला
अब बेरंग सा लागे
ये दुनिया का मेला
तुम तो लौट कर ना आयीं
बस तुम्हारी खुश्बू में लिपटी 
वो आम की सूखी पत्ती
ही है अब मेरे जीवन का सहारा ।




©Copyright Deeप्ती

8 comments:

  1. इसका नहीं मुझे कोई ज्ञान
    बस कुछ कहानियों का शायद अंत होता ही नहीं है
    और शायद होना भी नहीं चाहिए

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  2. Kiyaa baat hai ma'am bahut khub maza aa gaya pad kar

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    1. शुक्रिया आपका रिज़वान। आपको पसंद आयी 🙏

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  3. वाह.... अधूरे प्रेम की पावन कहानी....��

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  4. प्रेम कभी अधूरा नहीं होता ।प्रेम अपने आप में पूर्ण है। चाहे एक पल के लिए ही क्यों न हो वो अपने आप में सम्पूर्ण है।

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  5. Replies
    1. आपको पसंद आयी आपका बहुत आभार

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