Showing posts with label #love. Show all posts
Showing posts with label #love. Show all posts

Thursday, May 20, 2021

उसका खत


दरवाज़े की झिर्री से सरक आया
एक कागज का टुकड़ा
खोल उसे मैने पाया
था पैगाम उसके आने का

मुस्कान मेरी झलक उठी
अंखियां मेरी चमक उठी
मन की फुलवारी में
तितली अनेक मचलने लगीं

अरसा हुआ देखे हुए
कैसा दिखता होगा वो
चार साल होते नहीं कम
किसी को बदलते हुए

सब भूल सकता है वो
नहीं मुझे भूल पाया है
खत में ऐसा उसने लिखा था
मां का कर्ज उतारने आ रहा है

क्या कभी कोई उतार पाया
ममता का मोल चुका पाया
पगला है, ना जान पाया
मुझसे मिलना कहां भूल पाया है

उम्मीद की किरण चमकी
हलवा पूरी आज बनेगी
उसके स्वागत के बहाने
घर में दीवाली आज मनेगी

अंखियां मूंदने से पहले
हो गई हर मुराद पूरी
सीने से उसे लगा
भर लूंगी अपनी झोली

छोटा सा है खत उसका
उम्मीदों की स्याही सा
हज़ार बार हर शब्द पढ़
करूं इंतजार उसका अब
∆ १९/०५/२०२१∆
© Deeप्ती

Saturday, May 1, 2021

प्रेम का संदेश

मई की धूप में गुम थी मधु.. किन्हीं खयालों में खोई थी.. पसीने की बूंदे माथे पे रह रह कर अपना घर बना रही थीं। 

धूप का वो टुकड़ा उसकी हथेली पर तीखी मिर्ची सा महसूस हो रहा था। फिर भी वो बस, जैसे, उसे एकटक ताक रही थी। वो धूप का टुकड़ा अब उसकी हथेली से सरक कर मेज पर आ गया था, बिल्कुल अबोध बालक की तरह वहां पड़ा हुआ था। बेसुध, बेखौफ, बेपरवाह शिशु की तरह। कहां मतलब था उसे, कि धरती पर क्या हो रहा है।

वो उसे ताकते हुए, प्रभु का शुक्रिया अदा कर रही थी, की वो आभारी है, जो आज की सुबह देख पा रही है। इस महामारी ने पूरी दुनिया को जकड़ रखा है। हर तरफ बेबसी है, लाचारी है।

ना जाने कितने को खोया है .. अब तो जैसे सब बेहिसाब हो गया है। हर रोज़ कितने ही अपनी जान के लिए लड़ रहे हैं, मौत से। कुछ जीत रहे हैं तो कई हार रहे हैं।

मधु भी इस दौड़ में, लड़ाई में, जीत गई थी। लेकिन किस कीमत पर? कहने को तो जीत गई लेकिन फिर भी हार गई। इस दौड़ में सिर्फ वो ही जीत की रेखा पार कर पाई बाकी उसके अपनो ने तो ज़िन्दगी की यह दौड़ पूरी ही नहीं करी।

सब पीछे छूट गए, काल के हाथों मजबूर हो गए। वो अब अकेली इस खिड़की पर बैठी नन्हे पौधों को निहार रही थी, की अचानक उसकी नजर पास रखी कटोरी पर गई जिसमें उसने खरबूजे के बीज धो कर रखे थे। सूखने के लिए छोडे थे, उन्हें छील कर रखेगी यह सोचा था।

उसने हाथ बढ़ा कर वह कटॉरी उठाई और ढक्कन खोला। वो अंदर का दृश्य देख चौंक गई। अंदर बीज अंकुरित हो गए थे । वो उसे देख मुस्करा रहे थे, मानो कह रहे हो, ज़िन्दगी अपना रास्ता ढूंढ ही लेती है, बस थोड़ी खुली हवा और धूप की ज़रूरत होती है।

अब मधु मुस्करा रही थी। ज़िन्दगी उसकी चौखट पर दस्तक जो दे रही थी। कहां सब ख़तम हुआ है। अभी तो बहुत लंबी डगर है। 

उसमे से कुछ पौधे हाथ में लिए, वो बाहर आई । मिट्टी में बो देने के लिए। शायद कुछ पौधे पनप ही जाएं, कौन जाने??........

@Deeप्ती
✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨