मई की धूप में गुम थी मधु.. किन्हीं खयालों में खोई थी.. पसीने की बूंदे माथे पे रह रह कर अपना घर बना रही थीं।
धूप का वो टुकड़ा उसकी हथेली पर तीखी मिर्ची सा महसूस हो रहा था। फिर भी वो बस, जैसे, उसे एकटक ताक रही थी। वो धूप का टुकड़ा अब उसकी हथेली से सरक कर मेज पर आ गया था, बिल्कुल अबोध बालक की तरह वहां पड़ा हुआ था। बेसुध, बेखौफ, बेपरवाह शिशु की तरह। कहां मतलब था उसे, कि धरती पर क्या हो रहा है।
वो उसे ताकते हुए, प्रभु का शुक्रिया अदा कर रही थी, की वो आभारी है, जो आज की सुबह देख पा रही है। इस महामारी ने पूरी दुनिया को जकड़ रखा है। हर तरफ बेबसी है, लाचारी है।
ना जाने कितने को खोया है .. अब तो जैसे सब बेहिसाब हो गया है। हर रोज़ कितने ही अपनी जान के लिए लड़ रहे हैं, मौत से। कुछ जीत रहे हैं तो कई हार रहे हैं।
मधु भी इस दौड़ में, लड़ाई में, जीत गई थी। लेकिन किस कीमत पर? कहने को तो जीत गई लेकिन फिर भी हार गई। इस दौड़ में सिर्फ वो ही जीत की रेखा पार कर पाई बाकी उसके अपनो ने तो ज़िन्दगी की यह दौड़ पूरी ही नहीं करी।
सब पीछे छूट गए, काल के हाथों मजबूर हो गए। वो अब अकेली इस खिड़की पर बैठी नन्हे पौधों को निहार रही थी, की अचानक उसकी नजर पास रखी कटोरी पर गई जिसमें उसने खरबूजे के बीज धो कर रखे थे। सूखने के लिए छोडे थे, उन्हें छील कर रखेगी यह सोचा था।
उसने हाथ बढ़ा कर वह कटॉरी उठाई और ढक्कन खोला। वो अंदर का दृश्य देख चौंक गई। अंदर बीज अंकुरित हो गए थे । वो उसे देख मुस्करा रहे थे, मानो कह रहे हो, ज़िन्दगी अपना रास्ता ढूंढ ही लेती है, बस थोड़ी खुली हवा और धूप की ज़रूरत होती है।
अब मधु मुस्करा रही थी। ज़िन्दगी उसकी चौखट पर दस्तक जो दे रही थी। कहां सब ख़तम हुआ है। अभी तो बहुत लंबी डगर है।
उसमे से कुछ पौधे हाथ में लिए, वो बाहर आई । मिट्टी में बो देने के लिए। शायद कुछ पौधे पनप ही जाएं, कौन जाने??........
@Deeप्ती
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