" मां... मां.. मैं आ गया.. देखो क्या ले कर आया हूं... यह क्या मां घर में अंधेरा क्यूं है?? कितनी बार कहा है की सांझ होने पर बत्ती जला लिया करो। चलो कोई बात नहीं " कहते हुए मनोज ने बत्ती जला दी और बोला ..
"पता है मां.. आज मैं बहुत खुश हूं.. आज मेरे बॉस ने मेरी बड़ी तारीफ करी और कहा कि अबकी बार मुझे प्रमोशन भी देंगे.."
आशीष से भरे मां के नयन बस एक टक देखते रहे अपने लाल लो। हल्की सी मुस्कराहट के साथ वो खामोश रहीं... बहुत कुछ कहना चाहती थी.. लेकिन जैसे शब्दों का कोई मोल नहीं था भावनाओं के आगे।
"मां आज में बढ़िया खाना लाया हूं.. मटर पनीर , दाल मखनी और रोटी.. और हां साथ में तुम्हारे मनपसंद गुलाब जामुन भी है। और पता है वो जग्गू चाचा हैं ना अंबिकापुर वाले... उनके बेटे की शादी पक्की हो गई है.. फोन आया था.. आप तो जा नहीं पाओगी .. मैं ही छुट्टी कि बात करता हूं। शादी अगले महीने १५ तारीख को है।
नाराज़ मत हो बाबा...हां... हां... दवाइयां ले आया हूं। आपका आदेश सिर आंखों पर। डाक्टर साहब को दिखा दिया था .. ज़रा सी ही तो चोट है .. दो एक दिन में ठीक हो जाएगी। साइलेंसर ही तो छू गया था। ज़्यादा परेशानी नहीं है.. खैर .. छोड़ो.. सब बातें बाद में...
मै मुंह हाथ धो कर आता हूं फिर खाएंगे.. ठीक है.." कहता हुआ मनोज कपड़े बदलने चला गया।
बाहर आ कर बोला..
"अरे मां, आज तो कपड़े भी तो धोने है... आप बताते जाओ में करता जाऊंगा.. आप बस अपने शुभ आशीष दो मुझे .. फिर देखो कैसे में सारे काम निपटा दूंगा पल भर में.." कपड़े मशीन में डाल कर मनोज खाना लगाने लगा।
एक कौर तोड़ कर मां की ओर बढ़ाया.. बोला " मां सारी ज़िन्दगी आपने अपने हाथ से खिलाया है.. आज वक्त बदल गया है.. अब मैं आपको खिला रहा हूं।
बहुत याद आती है मां .. आपकी.. लेकिन आप मेरी चिंता मत करना ... मैं ठीक हूं.. सब संभाल लूंगा.. " दीवार पर टंगे फोटो फ्रेम में मां की तस्वीर के आगे बैठा मनोज, चुप चाप भोजन करने लगा......।
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