दरवाज़े की झिर्री से सरक आया
एक कागज का टुकड़ा
खोल उसे मैने पाया
था पैगाम उसके आने का
मुस्कान मेरी झलक उठी
अंखियां मेरी चमक उठी
मन की फुलवारी में
तितली अनेक मचलने लगीं
अरसा हुआ देखे हुए
कैसा दिखता होगा वो
चार साल होते नहीं कम
किसी को बदलते हुए
सब भूल सकता है वो
नहीं मुझे भूल पाया है
खत में ऐसा उसने लिखा था
मां का कर्ज उतारने आ रहा है
क्या कभी कोई उतार पाया
ममता का मोल चुका पाया
पगला है, ना जान पाया
मुझसे मिलना कहां भूल पाया है
उम्मीद की किरण चमकी
हलवा पूरी आज बनेगी
उसके स्वागत के बहाने
घर में दीवाली आज मनेगी
अंखियां मूंदने से पहले
हो गई हर मुराद पूरी
सीने से उसे लगा
भर लूंगी अपनी झोली
छोटा सा है खत उसका
उम्मीदों की स्याही सा
हज़ार बार हर शब्द पढ़
करूं इंतजार उसका अब
∆ १९/०५/२०२१∆
© Deeप्ती
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