Wednesday, April 4, 2018

अधूरे अलफाज़

सिमट जाने दो आज
कागज़ पर लफजो़ की हर सिलवट को
क्या खबर कितनी बेचैंनियां दबी हैं नादांने दिल में

गुफतगू करते वो खामोश दिल
धडकन के संमुंदर में बहते
करें इतंज़ार कशती का

उफनती लहरों की तनहांइयां
मोन शोर को समेट
बिखेरें मुस्कराहटें चटा्नों पर।

-०४/०४/२०१८-


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Friday, February 23, 2018

सरल जि़दगी

'भूरी'


वो अचानक सर्दी की एक दोपहर
मासूम निगाहों से कुछ माँगते हुए
मेरे कदमों में आ बैठी
प्यार से देख अवाज़ लगाती रही
उसकी बेचैनी मेरी ममता जगा गई
मेरे कदम बढे और दुध रोटी ले आए
ममता से मैंने जो उस पर हाथ फेरा
वो निशचिंत हो
अपनी भूख शांत करने बैठ गई
और तभी से मेरी साथी बन गई

कितनी आसान और मासूम होती है न जिंदगी
उसको न कुछ ज्यादा चाहिए हमसे
न ही दिखावट मैं है विशवास
एक कदम प्रेम का बस
झट से गले लगा लेती है
कुछ पल खेलती और फिर
अपनी राह निकल जाती है

ना जाने हम किन ख्यालों को दिल से जकडे रखते हैं
ना जाने क्यौं सुख में दुख ढुढंते हैं
सब कुछ कितना आसान है
दिल खुला रखना भर है
वो न्ऩहि सी जान अपनी मासूम निगाहों से
जि़दगी का सरल राज़ सिखा गई।

-२३/०२/२०१८-


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Thursday, August 31, 2017

दस्तक

आज दिल फिर धक धक कर रहा है
उस काले दिन की याद ताजा़ कर रहा
जब दऱवाजे़ की एक दस्तक में
जीवन का सूरज डूबा था
मुसकराने का हर मकसद टूटा था

एक स़दूक में भरा पूरा आंसमान था
वो टूटा फोटो फ्रेम
फटी जेब वाली पतलून
सीने पर लाल दाग वाली बुर्शट
तिरंगे में आँख मूंदे लिपटी उसकी टूटी ज़िदंगी
लौट आई थी उसके पास हमेशा के लिए
सूनी रातों को और सूना कर गई
रंगीन ख्वाबों को बदरंग कर गई थी


वो वतन की मिट्टी माथे से लगा
ढेंरों आँसू दिल में बसा
उस तमगे को सीने से लगा
जीने का मकसद ढूँढ रही थी

फक्र से अपने लाल को भेजा था फिर
उसी मिट्टी का कर्जं उतारने अभी कुछ दिन पहले


आज दिल फिर धडक रहा जो़र से
बेवक्त दरवाजे़ पर फिर दस्तक हुई है
उफ्फ... फिर दस्तक हुई है.....।

~31/08/2017~

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Friday, August 18, 2017

माँ सुन लो पुकार मेरी



माँ ये क्या हो रहा है
मेरे सारे दोस्त
जो सिर्फ हसंना या रोना जानते थे

कहाँ गुम हो गये हैं
एक के बाद एक
मासूम किलकारियाँ
किन अंधेरों में खोती जा रही हैं
क्या कसूर हे उनका
कितनी खुशियाँ लाए थे
कितने घर के दीपक जलाऐ थे
वो सारे दीपक क्युँ बुझ गये
क्युँ सारे पालने सूख गए

साँस भी क्या इन दरिंदो से पूछ कर लें
क्युं ये हिसाब रख रहे हमारी साँसों का
क्युँ दम घुट रहा बेज़ुबानो का

कोइ तो बचा लो मुझे
माँ तुमहीं आ जाओ
अपनी गोद में छुपा लो
मैं भी जीना चहाता हूं
इंद्रधनुशी सपने देखना चहाता हूं
इतनी जलदी अंधेरों के हवाले मत करो
उन सफेदपोशो का क्या
नोटों की गढ्ढी का परदा डाल आऐंगें
हमारी गुमसुम आवाज़ को दफना देंगें
अपना दोश किसी और के नाम मण
फिर ऐशो अराम से जीते रहेगें
हमें कौन बचाऐगा...... माँ।


-16/08/2017-

#GorakhpurTragedy



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Sunday, May 14, 2017

माँ

क्या शुभकामनाऐं दूं
सोचती बैठी में

क्या सिफ्र एक ही दिन तेरा
माँ तू तो हर रोज़ माँ है
तेरा प्रेम निछल है
हर फूल को समान रस है

तू यहाँ रहे न रहे
तेरा प्रेम अजर अमर है

यूं ही सदा मुसकराते रहना
अपने फूलों को संभाले रखना
अपने आंचल कि खुशबु से
सबका जीवन महकाए रखना।

-14/05/2017-



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Wednesday, May 10, 2017

सपने

जिंदगी की हसीन भोर 
खिलखिलाहटों में कब 
बीती कहां खबर

यूं हीं बीते आती
सांछ भी हमारी
मुसकराहटों तले

इक दूजे के सपने
अखियों में बसा
कर लें जीवन पार पथ।




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