जहां कभी बस्ता था बचपन
जहां खेलता था लड़कपन
छोड़ आए हम वो गलियां
जहां कभी गुजरती थी शाम सुहानी
जहां खेत खलियानों में पड़ता था पानी
छोड़ आए हम वो गलियां
जहां मासूमियत भरी शरारत थी
जहां स्वच्छंद खिलखिलाहट थी
छोड़ आए हम वो गलियां।
©Deeप्ती
Sometimes bright or dull colours captures my mind arena and pick up the brush to paint abstract picture of words on the canvass of the sky.
जहां कभी बस्ता था बचपन
जहां खेलता था लड़कपन
छोड़ आए हम वो गलियां
जहां कभी गुजरती थी शाम सुहानी
जहां खेत खलियानों में पड़ता था पानी
छोड़ आए हम वो गलियां
जहां मासूमियत भरी शरारत थी
जहां स्वच्छंद खिलखिलाहट थी
छोड़ आए हम वो गलियां।
©Deeप्ती
" मां... मां.. मैं आ गया.. देखो क्या ले कर आया हूं... यह क्या मां घर में अंधेरा क्यूं है?? कितनी बार कहा है की सांझ होने पर बत्ती जला लिया करो। चलो कोई बात नहीं " कहते हुए मनोज ने बत्ती जला दी और बोला ..
"पता है मां.. आज मैं बहुत खुश हूं.. आज मेरे बॉस ने मेरी बड़ी तारीफ करी और कहा कि अबकी बार मुझे प्रमोशन भी देंगे.."
आशीष से भरे मां के नयन बस एक टक देखते रहे अपने लाल लो। हल्की सी मुस्कराहट के साथ वो खामोश रहीं... बहुत कुछ कहना चाहती थी.. लेकिन जैसे शब्दों का कोई मोल नहीं था भावनाओं के आगे।
"मां आज में बढ़िया खाना लाया हूं.. मटर पनीर , दाल मखनी और रोटी.. और हां साथ में तुम्हारे मनपसंद गुलाब जामुन भी है। और पता है वो जग्गू चाचा हैं ना अंबिकापुर वाले... उनके बेटे की शादी पक्की हो गई है.. फोन आया था.. आप तो जा नहीं पाओगी .. मैं ही छुट्टी कि बात करता हूं। शादी अगले महीने १५ तारीख को है।
नाराज़ मत हो बाबा...हां... हां... दवाइयां ले आया हूं। आपका आदेश सिर आंखों पर। डाक्टर साहब को दिखा दिया था .. ज़रा सी ही तो चोट है .. दो एक दिन में ठीक हो जाएगी। साइलेंसर ही तो छू गया था। ज़्यादा परेशानी नहीं है.. खैर .. छोड़ो.. सब बातें बाद में...
मै मुंह हाथ धो कर आता हूं फिर खाएंगे.. ठीक है.." कहता हुआ मनोज कपड़े बदलने चला गया।
बाहर आ कर बोला..
"अरे मां, आज तो कपड़े भी तो धोने है... आप बताते जाओ में करता जाऊंगा.. आप बस अपने शुभ आशीष दो मुझे .. फिर देखो कैसे में सारे काम निपटा दूंगा पल भर में.." कपड़े मशीन में डाल कर मनोज खाना लगाने लगा।
एक कौर तोड़ कर मां की ओर बढ़ाया.. बोला " मां सारी ज़िन्दगी आपने अपने हाथ से खिलाया है.. आज वक्त बदल गया है.. अब मैं आपको खिला रहा हूं।
बहुत याद आती है मां .. आपकी.. लेकिन आप मेरी चिंता मत करना ... मैं ठीक हूं.. सब संभाल लूंगा.. " दीवार पर टंगे फोटो फ्रेम में मां की तस्वीर के आगे बैठा मनोज, चुप चाप भोजन करने लगा......।
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शत विशिप्त सा हुआ
लहू लुहान अंग अंग मेरा
मन में उमंग जीवित है
में देश का रक्षक हूं
घुसपैठिए को मार भगा दूं
आंख लहूलुहान कर दूं
मेरी मां पर नजर जो बुरी डाले
में रक्षक हूं आन का
सिर चाहे काट ही दो
शान से सिर उठा में जियुं
तमगो की ना चाह मुझे
में तो बस रक्षक हूं
लौट आऊंगा ज़रूर में
चाहे चल के पैरों पे
या ही आऊं बक्से में
में रक्षक ही रहूंगा
चाहे यादों में रहूं ना रहूं
खत्म कर दुश्मन को
में अपनी नजर में ज़िंदा हूं
हां हां में रक्षक हूं।
....30/04/2021...
©Deeप्ती
बदलते हालत
बिगड़ते जा रहे है
वक्त की इस आंधी में
यूं ही बहे जा रहे है
हर रोड़े को कर रहे थे पार
इस बार उसके
चक्रव्यूह में ही
फसते जा रहे है
है प्रभु, विलंब ना करो
कल्की रूप का है इंतजार
करवा दो ये नैय्या पार
एक एक कर के क्यूं
ले जा रहे हो
एक बार में ही
कर दो खत्म
दुनिया का यह व्यापार।
©deeप्ती