Friday, May 7, 2021

वो गलियां



जहां कभी बस्ता था बचपन
जहां खेलता था लड़कपन
छोड़ आए हम वो गलियां

जहां कभी गुजरती थी शाम सुहानी
जहां खेत खलियानों में पड़ता था पानी
छोड़ आए हम वो गलियां

जहां मासूमियत भरी शरारत थी
जहां स्वच्छंद खिलखिलाहट थी
छोड़ आए हम वो गलियां।

©Deeप्ती




शाप




धरती इत्रा रही अपनी हरियाली पर
पेड़ों पर, फूलों पर, सतरंगी रंगों पर
घमंड मे भर, चिडा रही सूरज को, चंदा को
शांत था सूरज, उसके भोलेपन पर 
चंदा भी चुप था देखता रहा छुप- छुप कर

मनुष्य ने तब, रौंदा धरती को
करा अपमानित उसके गर्व को
तार तार कर, हर पल, उसका मान
भेद कर उसको, बन रहा अनजान
धरती का भक्षक बन हुआ अब बलवान

अभिमान बन जाता है शाप
मत कर, मत कर, इतना पाप
सूरज और चंदा करते रहे अपना काम
घमंड का तब हुआ काम तमाम
रह जाएगा सब यहीं, शांति का करो जाप।

#05/05/2021#
©deeप्ती

Monday, May 3, 2021

मां और मनोज



" मां... मां.. मैं आ गया.. देखो क्या ले कर आया हूं... यह क्या मां घर में अंधेरा क्यूं है?? कितनी बार कहा है की सांझ होने पर बत्ती जला लिया करो। चलो कोई बात नहीं " कहते हुए मनोज ने बत्ती जला दी और बोला ..
"पता है मां.. आज मैं बहुत खुश हूं.. आज मेरे बॉस ने मेरी बड़ी तारीफ करी और कहा कि अबकी बार मुझे प्रमोशन भी देंगे.."

आशीष से भरे मां के नयन बस एक टक देखते रहे अपने लाल लो। हल्की सी मुस्कराहट के साथ वो खामोश रहीं... बहुत कुछ कहना चाहती थी.. लेकिन जैसे शब्दों का कोई मोल नहीं था भावनाओं के आगे।

"मां आज में बढ़िया खाना लाया हूं.. मटर पनीर , दाल मखनी और रोटी.. और हां साथ में तुम्हारे मनपसंद गुलाब जामुन भी है। और पता है वो जग्गू चाचा हैं ना अंबिकापुर वाले... उनके बेटे की शादी पक्की हो गई है.. फोन आया था.. आप तो जा नहीं पाओगी .. मैं ही छुट्टी कि बात करता हूं। शादी अगले महीने १५ तारीख को है।

नाराज़ मत हो बाबा...हां... हां... दवाइयां ले आया हूं। आपका आदेश सिर आंखों पर। डाक्टर साहब को दिखा दिया था .. ज़रा सी ही तो चोट है .. दो एक दिन में ठीक हो जाएगी। साइलेंसर ही तो छू गया था। ज़्यादा परेशानी नहीं है.. खैर .. छोड़ो.. सब बातें बाद में...
मै मुंह हाथ धो कर आता हूं फिर खाएंगे.. ठीक है.." कहता हुआ मनोज कपड़े बदलने चला गया।
बाहर आ कर बोला..

"अरे मां, आज तो कपड़े भी तो धोने है... आप बताते जाओ में करता जाऊंगा.. आप बस अपने शुभ आशीष दो मुझे .. फिर देखो कैसे में सारे काम निपटा दूंगा पल भर में.." कपड़े मशीन में डाल कर मनोज खाना लगाने लगा।

एक कौर तोड़ कर मां की ओर बढ़ाया.. बोला " मां सारी ज़िन्दगी आपने अपने हाथ से खिलाया है.. आज वक्त बदल गया है.. अब मैं आपको खिला रहा हूं।

बहुत याद आती है मां .. आपकी.. लेकिन आप मेरी चिंता मत करना ... मैं ठीक हूं.. सब संभाल लूंगा.. " दीवार पर टंगे फोटो फ्रेम में मां की तस्वीर के आगे बैठा मनोज, चुप चाप भोजन करने लगा......।

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Saturday, May 1, 2021

प्रेम का संदेश

मई की धूप में गुम थी मधु.. किन्हीं खयालों में खोई थी.. पसीने की बूंदे माथे पे रह रह कर अपना घर बना रही थीं। 

धूप का वो टुकड़ा उसकी हथेली पर तीखी मिर्ची सा महसूस हो रहा था। फिर भी वो बस, जैसे, उसे एकटक ताक रही थी। वो धूप का टुकड़ा अब उसकी हथेली से सरक कर मेज पर आ गया था, बिल्कुल अबोध बालक की तरह वहां पड़ा हुआ था। बेसुध, बेखौफ, बेपरवाह शिशु की तरह। कहां मतलब था उसे, कि धरती पर क्या हो रहा है।

वो उसे ताकते हुए, प्रभु का शुक्रिया अदा कर रही थी, की वो आभारी है, जो आज की सुबह देख पा रही है। इस महामारी ने पूरी दुनिया को जकड़ रखा है। हर तरफ बेबसी है, लाचारी है।

ना जाने कितने को खोया है .. अब तो जैसे सब बेहिसाब हो गया है। हर रोज़ कितने ही अपनी जान के लिए लड़ रहे हैं, मौत से। कुछ जीत रहे हैं तो कई हार रहे हैं।

मधु भी इस दौड़ में, लड़ाई में, जीत गई थी। लेकिन किस कीमत पर? कहने को तो जीत गई लेकिन फिर भी हार गई। इस दौड़ में सिर्फ वो ही जीत की रेखा पार कर पाई बाकी उसके अपनो ने तो ज़िन्दगी की यह दौड़ पूरी ही नहीं करी।

सब पीछे छूट गए, काल के हाथों मजबूर हो गए। वो अब अकेली इस खिड़की पर बैठी नन्हे पौधों को निहार रही थी, की अचानक उसकी नजर पास रखी कटोरी पर गई जिसमें उसने खरबूजे के बीज धो कर रखे थे। सूखने के लिए छोडे थे, उन्हें छील कर रखेगी यह सोचा था।

उसने हाथ बढ़ा कर वह कटॉरी उठाई और ढक्कन खोला। वो अंदर का दृश्य देख चौंक गई। अंदर बीज अंकुरित हो गए थे । वो उसे देख मुस्करा रहे थे, मानो कह रहे हो, ज़िन्दगी अपना रास्ता ढूंढ ही लेती है, बस थोड़ी खुली हवा और धूप की ज़रूरत होती है।

अब मधु मुस्करा रही थी। ज़िन्दगी उसकी चौखट पर दस्तक जो दे रही थी। कहां सब ख़तम हुआ है। अभी तो बहुत लंबी डगर है। 

उसमे से कुछ पौधे हाथ में लिए, वो बाहर आई । मिट्टी में बो देने के लिए। शायद कुछ पौधे पनप ही जाएं, कौन जाने??........

@Deeप्ती
✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨

Friday, April 30, 2021

में रक्षक हूं



शत विशिप्त सा हुआ
लहू लुहान अंग अंग मेरा
मन में उमंग जीवित है
में देश का रक्षक हूं

घुसपैठिए को मार भगा दूं
आंख लहूलुहान कर दूं
मेरी मां पर नजर जो बुरी डाले
में रक्षक हूं आन का

सिर चाहे काट ही दो
शान से सिर उठा में जियुं
तमगो की ना चाह मुझे
में तो बस रक्षक हूं

लौट आऊंगा ज़रूर में
चाहे चल के पैरों पे
या ही आऊं बक्से में
में रक्षक ही रहूंगा

चाहे यादों में रहूं ना रहूं
खत्म कर दुश्मन को
में अपनी नजर में ज़िंदा हूं
हां हां में रक्षक हूं।

....30/04/2021...
©Deeप्ती


Thursday, April 29, 2021

आभारी है🙏


हर तरफ महामारी है, 
बीमारी है
फिर भी हम तेरे 
आभारी है
क्योंकि हम में
अभी भी जीवन जारी है

चारो और परेशानी है
लाचारी है
हस्पताल में बेड की
भारी कमी आरही है
फिर भी हम आभारी है
जीने की ललक  जारी है

सांसे की बहुत
आह झाई है
करुण कृंदन से
हवा भारी है
हम तो अब भी आभारी है
हमने जीवन बाकी है

-29/04/2021-

© Deeप्ती

Sunday, April 18, 2021

विलंब ना करो



बदलते हालत
बिगड़ते जा रहे है
वक्त की इस आंधी में
यूं ही बहे जा रहे है
हर रोड़े को कर रहे थे पार
इस बार उसके
चक्रव्यूह में ही
फसते जा रहे है
है प्रभु, विलंब ना करो
कल्की रूप का है इंतजार
करवा दो ये नैय्या पार
एक एक कर के क्यूं
ले जा रहे हो
एक बार में ही
कर दो खत्म
दुनिया का यह व्यापार।

©deeप्ती