Tuesday, March 31, 2020

स्वच्छ



हटा जहरीले धुएँ का बादल
झाँक रहा नीला गगन ये पागल।

स्वच्छ हवा सँग लहराती पत्तियाँ
मधुरिम कुहक गुंजाती चिरईयाँ।

अनगिनत हीरे जड़ित सी रात
मुस्काते चाँद से करे मीठी बात।

पँछी, पत्ती और जन्तु हरेक
चहुँ ओर छाई खुशहाली अनेक।

~ २९/०३/२०२० ~

©Copyright Deeप्ती

धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र

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कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि पर हुआ था एक ऐतिहासिक धर्म युद्ध - कौरव और पांडव के बीच में - जो आज तक सभी के दिलो दिमाग पर छाया हुआ है।

युद्ध के पहले दिन अर्जुन ने देखा की उसके सामने खड़ी विशाल सेना है जिसमे उनके भीष्म पितामह , उनके गुरु द्रोणाचार्य  ,अश्वथथामा , उनके अनेक भाई व् रिश्तेदार हैं।

अचानक उनको भीषण वेदना ने घेर लिया और उन्होंने जाना की वे यह युद्ध नहीं लड़ना चाहते हैं।
"सिर्फ ज़मीन के एक टुकड़े के लिए में अपने प्रियजनों के साथ युद्ध नहीं कर सकता । नहीं यह युद्ध में नहीं करूँगा "
ये सोचते हुए उन्होंने अपना धनुष और अन्य शस्त्र नीचे रख दिया और अपना निर्णय श्री कृष्ण को बताया
"हे कृष्ण ! ये पाप है।  में अपने प्रियजनों के साथ युद्ध नहीं कर सकता।  सामने तो सब अपने खड़े हैं उनसे कैसा युद्ध "

कृष्ण जान चुके थे अर्जुन के मन में  दुविधा चल रही है।  उन्होंने अपना असली विशाल विश्व स्वरूपं अर्जुन को दिखाया


में ही निर्माता , रक्षक व् विध्वंसक 
में ही सर्वोच्च, में ही सूक्ष्म 
पूरा संसार मेरी इच्छा अनुसार चलता है 
मेरे इस रचाये हुए नाटक के तुम सिर्फ एक किरदार हो
जो भी कार्य सौपा जाये उसे अच्छे से करना तुम्हारा धर्म है 
तुम अपना कर्म करो , फल की चिंता मुझ पर छोड़ दो 
सब कुछ वैसा ही है जैसा होना चाहिए 
में भूत , वर्त्तमान और भविष्य सब जानता हूँ 
में हर जगह हूँ। 
में और कोई नहीं, 
में श्विष्णु हूँ । 




Thursday, March 5, 2020

नदी




नदी बन बहुँ में मस्त
अठखेलियाँ खाऊँ पर्वत के समस्त
चंचल मन , यौवन तन
इधर उधर इठलाऊँ में

देखो, गुस्सा ना दिलाना
पागल मुझको ना बनाना
एक बार जो बिफर गयी
हाथ ना में फिर आऊँगी
कर के नष्ट सब रोडो को
आगे बढ़ती जाऊँगी

रुकना मैंने सीखा नहीं
बाँध ना मुझको पाओगे
बाहों में भरना जो चाहो
हाथ से फिसल में जाऊँगी

समझा क्या है तुमने मुझको
आज़ाद नदी हूँ में
बहना मेरा काम है
रुकने से अनजान हूँ 
नदी हूँ , एक शीतल
अल्हड़ नदी हूँ में ।




~~07/05/08~~

©Copyright Deeप्ती

Friday, November 22, 2019

नयी सुबह

पुष्कर २०१५ 



एक अंत तो एक शुरुवात 
जैसे हों दिन और रात 
एक ही सिक्के के दो पहलु 

यादों से आस तक का सफर 
पल में तय कर लेता है 
तजुर्बे और विश्वास 
की तर्ज़ पर 
नए सपने संजो लेता है 

टूटे वादों को निभाने की 
कसम खाता है 
और जो छूट जाता है 
उसपर आँसू नहीं बहाता 
नयी राह से नयी दिशा पकड़ 
आगे बढ़ता जाता है। 

सच्ची सीख देता है हमको 
ये विचित्र और अद्भुत 
दिसंबर से जनवरी तक 
का यह छोटा सा सफर
जीवन और मृत्यु भी तो 
यही है बस 
दिसम्बर से जनवरी के एक पल का सफर।  
~ २२/११/२०१९~ 

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Monday, November 4, 2019

लम्हे

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लम्हे तो लम्हे है हर पल 
गुज़रते जाते हैं 
सूखी रेत से फिसलते जाते हैं 
कुछ सीख लिया तो अच्छा 
नहीं सीखा तो भी अच्छा 
मुस्कराते रहो 
गुनगुनाते रहो 
लम्हो का यही फ़साना है। 

क्या सोचे क्या हुआ 
क्या समझे क्यों हुआ 
पीछे मुड़ कर देखे क्यों 
आगे नए सपने खड़े 
कुछ नए लम्हों 
में जकड़े हुए 
आओ हाथ बढ़ा के 
थाम ले झोली भर-भर कर। 

आओ कुछ नए लम्हे गढ़ें 
कुछ नयी यादे बनाएं  
थोड़ा थोड़ा जी लें 
थोड़ा थोड़ा रम लें 
नादाँ लम्हों से 
कुछ और सीख लें 
ये ही तो हैं बस हमारे 
अपने आप को खोज लें। 


~ ०४/११/२०१९~ 

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Thursday, October 24, 2019

दिवाली 2019



दिवाली आई दिवाली आई
दीपों की माला लायी 
आओ मिलजुल कर सब 
करें सफाई जी भर कर 
देखो उस कोने को 
धुल से अटा पड़ा है 
पुरानी यादों का कूड़ा 
घर भर में फैला पड़ा है 


दिवाली आई दिवाली आई
खुशियों की सौगात लाई 
आओ अंदर झांक के अपने 
करें सफाई दिमाग के अपने 
देखो कैसे जाले लगे हैं 
चीर के उखाड फेंकने हैं 
मन में जमे मलाल का मेल 
साफ़ करने का पैगाम लाई 

दिवाली आई दिवाली आई
रौशनी की जगमग बहार लायी 
आओ मिलजुल के काम करें 
दिल के अंधियारे दूर करें 
रिश्तों की मिठास घोल 
जीवन को कुछ और मीठा कर जाएँ 
ग़लतफ़हमी के अंधियारे 
दूर कर बढ़ चलें रौशनी की ओर 

दिवाली आई दिवाली आई
खुशियां अपरम्पार लायी। 

-शुभकामनायें दीपो के त्यौहार की-
~ २४/१०/२०१९ ~ 
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Monday, September 16, 2019

अल्फ़ाज़



कुछ ख्यालों के ताने बाने
बिखरे थे कलम के ज़रिये
पहुंचे शुष्क पड़े पन्नो पे
पिरो रहे थे माला सी

एक के बाद एक
कई फ़साने को जोड़ तोड़
भरा खज़ाना शब्दों से
खोल उन्ही पन्नो को जब देखा
झाँक रहे थे सब मुस्काते

जैसे कह रहे हो
"देखा! कैसे चमक रहे हैं
अफ़साने अपने गढ़ रहे हैं
हम ही तो है तेरे वो ख्याल
जो ना जाने कब से सिमट रहे हैं"

शर्मा के हाथ बढ़ाया
हाँ! आज मिली है मंज़िल उन्हें
अरमानो ने पंख लगा
आज देखा है उन्मुक्त गगन।

~ १६/०९/२०१९~

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